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एएमयू कुलपति ने किया लाॅ सोसाइटी रिब्यू का विमोचन

 मुकेश भारद्वाज,अलीगढ़- अमुवि के विधि विभाग की लाॅ सोसाइटी द्वारा प्रकाशित ‘‘लाॅ सोसाइटी रिव्यू 217-18’’ का विमोचन कुलपति प्रो. तारिक मंसूर द्वारा कुलपति कार्यालय में किया गया। इसमें देश भर के छात्रों व शिक्षाविदों के 35 शोध पत्रों को शामिल किया गया है।कुलपति ने लाॅ सोसाइटी श्रिव्यू के प्रकाशन पर

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सांसद व विधायक घायल गौड़ से मिले

नीरज चक्रपाणि,हाथरस-भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष देवचन्द्र गौड़ के सड़क दुर्घटना में घायल होने पर सांसद राजेश दिवाकर व सिकन्द्राराऊ विधायक वीरेन्द्र सिंह राना ने अस्पताल जाकर उनके स्वास्थ्य के बारे में जानकारी ली। इसके अलावा सांसद राजेश दिवाकर ने दिल्ली वाला मौहल्ला निवासी पं. ऋषि कुमार दीक्षित की धर्मपत्नी श्रीमती शकुन्तला

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रक्तदान करने पर राहुल का सम्मान

नीरज चक्रपाणि,हाथरस- कामरेड भगवानदास मार्ग स्थित आर्य समाज मुरसान द्वार में पुलिस दरोगा राहुल सांगवान का स्वागत आर्य समाजियों द्वारा गर्मजोशी के साथ किया गया। सांगवान ने बीमार बच्चे को अपना रक्त देकर उसके जीवन की रक्षा की थी। इस अवसर पर जिला प्रधान रमेशचन्द्र आर्य ने कहा कि ऐसे पुलिस

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बच्चे के उपचार को रामेश्वर ने दी आर्थिक मदद पल्लेदार के परिवार को 5 लाख रू. मदद की मांग

मुकेश भारद्वाज,हाथरस- अपने बच्चे के इलाज के लिये लाचार मां द्वारा लोगों से भीख मांगे जाने के बाद समाचारपत्रों में समाचार प्रकाशित होने पर उक्त लाचार मां की मदद के लिये बसपा नेता व पूर्व ब्लाक प्रमुख रामेश्वर उपाध्याय ने मदद का हाथ बढ़ाया है और घायल बच्चे के उपचार

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निशुल्क नेत्र शिविर में 402 मरीजों का परीक्षण 41 के होंगे आॅपरेशन व 165 को मिलेंगे चश्मे

हाथरस-19 मार्च। गऊशाला रोड स्थित सावन कृपाल रूहानी मिशन की शाखा सन्त कृपाल आश्रम पर आध्यात्मिक सत्संग का आयोजन आॅडियो-वीडियो के माध्यम से किया गया। जिसमें परम संत राजिन्दर सिंह जी महाराज ने फरमाया कि हमारे जीवन में हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है, जैसा हम बोयेंगे, अवश्य वैसा ही

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गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में समाजवादी पार्टी की भारी अंतर से जीत

फ्रन्ट लाइन डेस्क लखनऊ। गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में समाजवादी पार्टी को भारी अंतर से जीत का स्वाद चखने को मिला है। सपा का सीएम योगी और डिप्टी सीएम केशव की सीटों पर जीतना अपने आप में सभी के लिए हैरान कर देने वाला है। किसी को भी उम्मीद नहीं

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नर्सिंग सेवा समाज की महत्वपूर्ण सेवा है-डा. विजेन्द्र सिंह

नीरज चक्रपाणि,हाथरस- आगरा रोड पाॅलीटैक्निल के पीछे प्रेम रघु नर्सिंग एण्ड पैरामैडीकल इन्स्टीट्यूट पर आज लैम्प लाइट सैरीमनी 2017-18 का आयोजन किया गया। जिसका उद्घाटन अपर मुख्य चिकित्साधिकारी डा. विजेन्द्र सिंह ने फीता काटकर व दीप प्रज्जवलित कर किया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि गवर्मेन्ट पेंशनर्स वेलफेयर आर्गेनाइजेशन के अध्यक्ष अमृत

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बदलते मौसम में बचाव जरूरी- डा. रूपकिशोर

नीरज चक्रपाणि,सासनी- बदलते मौसम में स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए दवाओं का सहारा लेना जरूरी हैं। दवाओं में भी ऐसी दवाओं का प्रयोग किया जाए जो स्वास्थ्य में फायदे की जगह नुकसान न पहुंचा दे। इसके लिए होम्यापैथिक दवाओं में खसरा, चेचक, स्नोपाॅक्स आदि की दवा समय से ले

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खुर्जा में महिला चिकित्सालय बना महिला चिकित्सकों का अखाड़ा

--मरीजों की उपस्थिति में ही जमकर एक दूसरे से कर रही हैं महिला चिकित्सक जुबान के तीखे सायकों के वार। Prasoon Bajpai  खुर्जा। नगर का एकमात्र सरकारी महिला चिकित्सालय इस समय चिकित्सकों के लिए युद्ध का अखाड़ा बना हुआ है। महिला चिकित्सक एक दूसरे पर जुबान के तीखे सायकों से जमकर वार

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युद्ध स्मारकों को जातीय चश्में से न देखा जाए – सुशील स्वतंत्र 

सुशील स्वतंत्र  नया साल हर तीन सौ पैंसठ दिनों के बाद आ जाता है लेकिन 2018 के पहले दिन को हम इस लिहाज से अलग कह सकते हैं कि इस दिन ने देश के दो युद्ध स्मारकों को भी जातीय बहस का हिस्सा बना डाला| 200 वर्ष पहले 500 महारों की ब्रिटिश सैन्य टुकड़ी ने हजारों पेशवा सैनिकों को धूल चटाकर मराठा शासन को इस देश से खत्म किया था| उन वीर लड़ाकों की याद में अंग्रेजों ने वैसा ही युद्ध स्मारक भीमा कोरेगांव में ‘जय स्तंभ’ (विक्ट्री पिलर) के नाम से बनाया जैसा देश की राजधानी दिल्ली में इंडिया गेट के नाम से बनवाया गया है| यह अंग्रेजों की परम्परा रही है| ऐसे विजय के प्रतीक देश के अन्य स्थानों पर आज भी मिल जाएंगें| दिल्ली के नजदीक नॉएडा के गाँव छलेरा में भी ऐसा ही एक युद्ध स्मारक है जिसे स्थानीय लोग ‘विजय गढ़’ कहते हैं| युद्ध में शहीद सैनिकों के गाँव के आस-आस ब्रिटिश हुकूमत ऐसे स्मारकों का निर्माण करवा दिया करती थी| 1 जनवरी 1818 को छोटी सी महार सैन्य टुकड़ी द्वारा अनुशासित, प्रशिक्षित और सुसज्जित मानी जाने वाली विशाल पेशवा सेना पर प्राप्त किए गए विजय के भारत के दलित समाज के लिए अनेक मायने हैं| 19वीं सदी के पेशवा राज में दलितों की सामाजिक स्थिति को समझे बिना, कोरेगांव विजय का दलितों के लिए महत्त्व को नहीं समझा जा सकता है| भारतीय इतिहास का यह वही कलंकित दौर था जब जाति विशेष के लोगों के गले में हांडी और कमर में झाड़ू बंधा होता था| जब जाति को छिपाना अक्षम्य अपराध की श्रेणी में आता था| पेशवा शासकों द्वारा इंसानों के एक समुदाय को अछूत घोषित कर उनपर लम्बे समय से शोषण और भेदभाव किया जा रहा था| भीमा कोरेगांव विजय ने इस देश से पेशवा राज का अंत कर अंग्रेजी हुकूमत को बहाल किया| भारत का दलित समाज आज भी 1 जनवरी को क्रूर पेशवाओं पर प्राप्त विजय के दिन को ‘शौर्य दिवस’ के रूप में मनाता है| यहां यह समझना बहुत जरूरी है कि यह महज जातीय कारणों से नहीं बल्कि विशुद्ध रूप से सामाजिक कारणों की वजह से किया जाता है| अपमान और अमानवीयता के जीवन से मुक्ति पाने के लिए और सम्मान व स्वतंत्रता हासिल करने के लिए दुनिया में अनेक क्रांतियां हुयीं हैं| भीमा कोरेगांव में निर्मित जय स्तंभ (विक्ट्री पिलर) पर हर साल 1 जनवरी को हजारों की संख्या में न सिर्फ दलित बल्कि मराठा, मुस्लिम, प्रगतिशील, बौद्ध और ओबीसी समुदाय के लोग शौर्य दिवस मनाकर 1818 युद्ध के उन महार लड़ाकों को सम्मान देने के लिए एकत्रित होते हैं| यह एक सच है कि भीमा कोरेगांव भारत की एक बड़ी आबादी के लिए तीर्थ बन चुका है लेकिन यह भी एक कड़वा सच है कि इस देश की मुख्यधारा की मीडिया इसकी घोर अनदेखी करता चला आया है| नववर्ष की चकाचौंध भरी खबरों, अपराध की घटनाओं, छलकते जामों और गैर-जरूरी न्यू इयर सेलिब्रेशंस के लिए जितना ‘स्पेस’ भारत की प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में दिया जाता है, उसके मुकाबले भीमा कोरेगांव की मुक्तिगाथा के लिए स्थान नगण्य रहा है| इस वर्ष तो मीडिया ने हद्द तब कर डाला जब अनेक अखबारों और वेबसाइट पर यह लिख दिया गया कि 1818 में पेशवा सेना के खिलाफ लड़ा गया युद्ध ‘भारत’ के खिलाफ लड़ी गयी लड़ाई थी| सबसे पहले मीडिया को यह समझना होगा कि जिस कालखंड में भीमा कोरेगांव की लड़ाई हुयी थी या उस दौर की अन्य लड़ाईयां अंग्रेजों या अन्य आक्रांताओं द्वारा की गयी थीं, उस समय तक ‘भारत एक राष्ट्र’ जैसी कोई संकल्पना ही नहीं बनी थी| इस भौगोलिक भूभाग के अनेक खंड थे जिस पर अलग-अलग व्यक्तियों या कहें वंशों का शासन चलता था| युद्ध होते थे और विजेता को राज करने का अधिकार मिल जाता था| घुम्मकड़ और लड़ाकू क़बीलों के दौर से राजघरानों तक जैसे अनेक आक्रमणकारी भारत में आए वैसे ही अंग्रेज भी यहाँ आए। तब तक ‘भारत देश’ जैसी कोई कल्पना नहीं थी| 200 साल राज करने के बाद भी जब अंग्रेज वापस जा रहे थे, मतलब आज़ादी व विभाजन से पहले तक यहाँ ब्रिटिश शासित क्षेत्र के अलावा भी छोटे-बड़े कुल 565 स्वतन्त्र रियासतें थी| भारत का मौजूदा स्वरूप तो इन सब को एक सूत्र ...

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